बीजेपी विधायक के बेटे की मुश्किलें बढ़ीं, कोर्ट ने जारी किया परमानेंट वारंट
ग्वालियर: मध्य प्रदेश की एक विशेष एससी-एसटी अदालत ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के विधायक प्रीतम सिंह लोधी के पुत्र दिनेश लोधी के खिलाफ एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। न्यायालय ने आरोपी को कानून की नजरों में भगोड़ा मानते हुए उसके खिलाफ स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी करने का हुक्म दिया है। विशेष न्यायाधीश नवीन कुमार शर्मा ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए साफ निर्देश दिए हैं कि केस डायरी और मुख्य रिकॉर्ड के पहले पन्ने पर लाल स्याही से आरोपी के फरार होने की बात दर्ज की जाए और मामले से जुड़ी फाइल को बेहद सुरक्षित तरीके से रखा जाए।
सालों से कानून की गिरफ्त से दूर है आरोपी
न्यायालय के दस्तावेजों के मुताबिक, ग्राम जलालपुर के रहने वाले दिनेश लोधी पर ग्वालियर के पुरानी छावनी पुलिस स्टेशन में अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी-एसटी एक्ट) के तहत गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज है। इस कानूनी मामले में आरोपी के खिलाफ सबसे पहला गिरफ्तारी वारंट करीब ढाई साल पहले, यानी 28 दिसंबर 2023 को अदालत द्वारा जारी किया गया था। लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रियाओं और पुलिस की लगातार कोशिशों के बाद भी आरोपी न तो पुलिस के हत्थे चढ़ा और न ही उसने खुद न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण किया।
पुलिस की लाचारी और रिपोर्ट पर न्यायिक फैसला
मामले की हालिया सुनवाई के दौरान पुरानी छावनी थाने के जिम्मेदार पुलिस कर्मियों ने अदालत के सामने अब तक की गई कार्रवाई का ब्यौरा और पंचनामा पेश किया। पुलिस विभाग की तरफ से प्रस्तुत की गई इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि आरोपी के संभावित ठिकानों पर दबिश देने के बावजूद उसका कोई सुराग नहीं मिल सका है और वह जानबूझकर कानून की पकड़ से दूर भाग रहा है। पुलिस द्वारा सौंपे गए इसी जांच प्रतिवेदन और साक्ष्यों को आधार बनाते हुए अदालत ने आरोपी को औपचारिक रूप से फरार घोषित करने का निर्णय लिया।
स्थायी वारंट के जरिए अब हमेशा रहेगी शिकंजा कसने की तैयारी
पुलिस की विफलता और आरोपी के रवैये को देखते हुए विशेष एससी-एसटी अदालत ने यह साफ कर दिया है कि अब दिनेश लोधी के खिलाफ जारी हुआ यह स्थायी गिरफ्तारी वारंट तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक कि उसे कानूनन गिरफ्तार नहीं कर लिया जाता। इसका मतलब यह है कि इस वारंट की कोई समय सीमा नहीं होगी और कानून की नजरों में वह तब तक एक वांछित अपराधी बना रहेगा जब तक कि उसे न्यायालय के कटघरे में खड़ा नहीं कर दिया जाता।
रसूखदार पृष्ठभूमि के चलते प्रशासन की साख दांव पर
चूंकि यह पूरा मामला सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के एक प्रभावशाली विधायक के परिवार से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस अदालती आदेश के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस महकमे पर दबाव काफी बढ़ गया है। माननीय न्यायालय के सख्त रुख के बाद अब स्थानीय पुलिस प्रशासन की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी बन गई है कि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के आरोपी की धरपकड़ सुनिश्चित करें। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि पुलिस इस रसूखदार आरोपी को कितनी जल्दी कानून के हवाले कर पाती है।
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