दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' के समर्थन में बोले अनुराग कश्यप, बयान वायरल
पंजाब के मानवाधिकार आंदोलन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी बहुचर्चित फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर भारतीय सिनेमा जगत और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मशहूर फिल्ममेकर हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी और दिलजीत दोसांझ स्टारर इस फिल्म को रिलीज के महज दो दिन बाद ही ओटीटी प्लेटफॉर्म जी५ (ZEE5) से अचानक हटा दिया गया है। फिल्म को बिना किसी पूर्व सूचना के प्लेटफॉर्म से गायब किए जाने पर बॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक और अपनी बेबाक राय के लिए मशहूर अनुराग कश्यप ने गहरा रोष व्यक्त किया है। अनुराग कश्यप ने इस कथित डिजिटल प्रतिबंध पर कड़े सवाल उठाते हुए आम जनता और सिनेमा प्रेमियों से एक बेहद चौंकाने वाली अपील कर दी है, जिसने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है।
प्रतिबंध पर भड़के कश्यप: ‘बैन का नियम है, लोग इसे और ज्यादा देखेंगे’
अनुराग कश्यप ने इस पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जताते हुए अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल पर एक के बाद एक कई स्टोरीज साझा कीं। पहली स्टोरी में उन्होंने सेंसरशिप और प्रतिबंध की मानसिकता पर कड़ा प्रहार करते हुए लिखा, "किसी भी कलाकृति या फिल्म को प्रतिबंधित करने के साथ सबसे मजेदार बात यह होती है कि आप उसे जितना दबाने या बैन करने की कोशिश करेंगे, जनता के बीच उसे देखने की उत्सुकता उतनी ही अधिक बढ़ जाएगी। सच कहूं तो मेरा पहले इस फिल्म को देखने का कोई विशेष इरादा नहीं था, लेकिन अब जब इसे जबरन हटाया गया है, तो मैं इसे हर हाल में देखूंगा।"
सिनेमा प्रेमियों से विवादित अपील: ‘पायरेसी करो, लेकिन फिल्म जरूर देखो’
इसके कुछ ही समय बाद अनुराग कश्यप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक और पोस्ट साझा किया, जिसमें वे सीधे तौर पर फिल्म ‘सतलुज’ का समर्थन और प्रचार करते नजर आए। अपनी इस पोस्ट में उन्होंने दर्शकों से किसी भी माध्यम से फिल्म देखने का आग्रह किया, भले ही वह माध्यम गैर-कानूनी ही क्यों न हो। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा, "मेरी सभी से गुजारिश है कि इस फिल्म को जरूर देखें। चाहे इसके लिए आपको पायरेटेड कॉपी का ही सहारा क्यों न लेना पड़े, लेकिन इसे पायरेट करें और देखें।" कश्यप के इस बयान के बाद फिल्म इंडस्ट्री और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि एक स्थापित फिल्ममेकर द्वारा पायरेसी का समर्थन करना बेहद दुर्लभ माना जाता है।
क्या है ‘सतलुज’ की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी?
फिल्म ‘सतलुज’ की कहानी 1990 के दशक के पंजाब की वास्तविक और दर्दनाक घटनाओं पर आधारित है। फिल्म में अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने पंजाब के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा का मुख्य किरदार निभाया है। जसवंत सिंह खालरा मूल रूप से एक साधारण बैंक कर्मचारी थे, लेकिन पंजाब के अशांत दौर में मानवाधिकारों के हनन को देखकर वे एक सक्रिय कार्यकर्ता बन गए।
उन्होंने 1980 और 1990 के दशक के दौरान पंजाब में सुरक्षा बलों द्वारा किए गए कथित फर्जी एनकाउंटरों (मुठभेड़ों) और लावारिस बताकर किए गए हजारों शवों के गुप्त अंतिम संस्कारों के कड़वे सच को दुनिया के सामने उजागर किया था। इसी मानवाधिकार आंदोलन के बीच, सितंबर 1995 में जसवंत सिंह खालरा अचानक रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हो गए थे। इसके लगभग एक दशक बाद अदालत ने पंजाब पुलिस के चार अधिकारियों को उनके अपहरण, प्रताड़ना और हत्या का दोषी पाते हुए सजा सुनाई थी। हालांकि, दुखद बात यह है कि खालरा का पार्थिव शरीर आज तक बरामद नहीं हो सका।
4 साल की लंबी कानूनी लड़ाई और ‘पंजाब 95’ से ‘सतलुज’ बनने का सफर
यह फिल्म अपनी मेकिंग के समय से ही विवादों और सेंसरशिप के साए में रही है। इस फिल्म का मूल नाम पहले ‘पंजाब 95’ रखा गया था। फिल्म को सिनेमाघरों या ओटीटी पर लाने के लिए मेकर्स को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के साथ करीब चार साल तक लंबी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई लड़नी पड़ी। सेंसर बोर्ड ने फिल्म के विषय को बेहद संवेदनशील मानते हुए इसमें करीब 120 कट्स (दृश्य और संवाद हटाने) की कड़ी शर्त रखी थी।
काफी खींचतान के बाद, 3 जुलाई को इस फिल्म को बिना किसी कट के, लेकिन एक नए शीर्षक ‘सतलुज’ के साथ सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म जी५ पर स्ट्रीम किया गया था। लेकिन रिलीज के महज 48 घंटे बाद ही यानी 5 जुलाई को इसे प्लेटफॉर्म से पूरी तरह डिलीट कर दिया गया। इस पर ओटीटी कंपनी ने केवल इतना कहा कि 'कुछ आंतरिक बदलावों' के कारण ऐसा किया गया है, जबकि मनोरंजन उद्योग से जुड़ी रिपोर्ट्स की मानें तो सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियमों के उल्लंघन और कुछ राजनीतिक व सामाजिक आपत्तियों के चलते फिल्म पर यह डिजिटल कैंची चलाई गई है। आपको बता दें कि इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ के अलावा अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यन ने भी मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।
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