महिलाओं के प्रयास से शराब मुक्त हुआ गांव, अब नहीं होती घरेलू कलह

मंडला: आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला के विकास खंड निवास के ग्राम पंचायत सतपहरी के पोषक ग्राम महुआटोला में शराब बंद हुए एक वर्ष हो गया है। यहां की शराब बंदी में ग्रामीण महिलाओं का पूर्ण योगदान रहा है। महिलाओं ने ही पुरुषों की प्रताड़ना से तंग आकर गांव में यह मुहिम चलाई थी।

नारी शक्ति का प्रदर्शन
आदिवासी गांव को शराबमुक्त कराना महिलाओं के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम न था। क्योंकि वे जिनका विरोध कर रही थी वे कोई और नहीं बल्कि उन्हीं के भाई, जेठ, देवर, पति में से कोई एक था। इससे भी बड़ी बात यह थी कि पुरुष प्रधान समाज में अपनों का विरोध करना भी धर्मयुद्ध के समान था। लेकिन गांव की महिलाओं ने संगठित हो नारी शक्ति का परिचय देते हुए शराबबंदी के लिए कमर कस ली। वे शराबखोरी के विरोध में जो खड़ी हुईं फिर जो भी सामने आया नहीं देखा कि यह भाई है कि यह पति है जिसने भी शराब को हाथ लगाया उसे इन्होंने दण्डित किया।

धर्मयुद्ध की तरह था अभियान
गांव की एक महिला चंद्रवती बाई के अनुसार, चूंकि हम ग्रामीण क्षेत्र से हैं जहां महिलाओं का घूंघट ही उसका सबसे बड़ा श्रृंगार होता है वहां यदि अपने ससुर, जेठ आदि बड़ों का सामना होने की स्थिति पर वह हमारे लिये अग्निपरीक्षा से कम न था इस धर्म संकट की परिस्थिति को हमने धर्मयुद्ध की तरह संकल्पित होकर सामना किया और सत्य का साथ दिया और हमेशा जीत सत्य की ही होती है सो हम सभी को इस आंदोलन में सफलता मिली।

महिलाओं ने किया पुरुषों को बाध्य
गांव की महिलाओं ने अपनी मर्जी के मुताबिक अर्थदण्ड सुनिश्चित किया कि जिसके घर में शराब बनाई जाएगी उससे 5000 रुपए, जो सेवन करेगा उससे 500 रूपए का आर्थिक दण्ड वसूला जायेगा। वहीं जो इसकी सूचना देगा उसे पुरस्कार स्वरूप 500 रुपए दिए जायेंगे। इस नियम मनवाने के लिए भले ही महिलाओं को डंडों का ही सहारा क्यों न लेना पड़ा हो लेकिन नियम को टूटने नहीं दिया और पुरुष को मानने पर मजबूर किया।

भागीरथी प्रयास
महिलाओं के द्वारा उठाया गया यह कदम लगभग 200 आदिवासी परिवार वालों के लिए भागीरथी प्रयास साबित हुआ है। इसकी भूरी भूरी प्रशंसा आसपास के गांवों में की जाती है। उनके अनुसार गांव की महिलाओं ने असंभव काम को संभव कर दिखाया। महिलाओं के अटल निश्चय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नारी जो ठान ले वह करके ही दम लेती है।