इन देशों में भी क्‍लाइमेट इमरजेंसी, भारत में लागू करने की मांग, भूटान से लेनी होगी सीख

नई दिल्‍ली। बढ़ते प्रदूषण और ग्‍लोबल वर्मिंग से धरती को बचाने के लिए दुनिया के कई देशों में लोगों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए स्वत: स्फूर्त ऐसा जन आंदोलन खड़ा कर दिया है जिसमें मांग की जा रही है कि सरकार शून्य कार्बन उत्सर्जन की एक मियाद तय कर दे। पिछले तीन साल में इस आंदोलन में जोर पकड़ा है। पर्यावरण और उससे जुड़े मसलों पर जैसे जैसे लोग जागरूक हो रहे हैं, उन्हें समझ आ रहा है कि अगर अभी नहीं चेते तो हमारी पीढ़ियों का भविष्य बीमारियों और संकटों से ग्रस्‍त होगा। उनके लिए न तो शुद्ध हवा होगी, स्वच्छ पानी से वे गला नहीं तर कर सकेंगे। पर्यावरण दमघोंटू हो चुका होगा। मौसम-चक्र इतना असंतुलित हो चुका होगा कि सर्दी-गर्मी और बारिश की आवृत्ति-प्रवृत्ति को इन्सानी शरीर सह नहीं सकेगा।

क्‍लाइमेट इमरजेंसी घोषित करने की मांग

सरकार 2020 तक पूरी खेती को कार्बनिक में तब्दील करने जा रही है। 2030 तक यह देश कचरा मुक्त होने की भी मंशा रखता है। परदेसी पर्यटकों के आगमन को सीमित करने के लिए प्रति व्यक्ति 250 डॉलर प्रतिदिन का शुल्क तय है। लेकिन भारत की राजधानी दिल्‍ली समेत कई शहर प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। यही वजह है कि भारत में भी सुप्रीम कोर्ट में जलवायु आपातकाल घोषित करने को लेकर एक याचिका डाली गई है। याचिका में मांग की गई है कि 2025 तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन शून्य स्तर पर लाना सरकार सुनिश्चित करे।

कहां कहां लागू हुआ जलवायु आपातकाल

दिल्‍ली ही नहीं दुनिया के कई शहर प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। पांच दिसंबर 2016 को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में डेयरबिन शहर में आपातकाल लागू किया गया। एक मई 2019 को ब्रिटेन की संसद ने जलवायु आपातकाल घोषित किया। इस देश के एक दर्जन से अधिक शहर और कस्बे ऐसा पहले ही कर चुके हैं। जून 2019 में पोप फ्रांसिस ने वेटिकन सिटी में इमरजेंसी आपातकाल घोषित किया। आयरलैंड, पुर्तगाल, कनाडा, फ्रांस, अर्जेंटीना, स्पेन, आस्ट्रिया सहित कई देशों ने ऐसा उपबंध लागू कर दिया है। अक्टूबर, 2019 तक दुनिया के 1143 ऐसे प्रशासन प्रणाली या स्थानीय सरकारें हैं जिन्होंने जलवायु आपातकाल को कालू कर दिया है।

भूटान से सीखें प्रकृति प्रेम

भारत ने दुनिया को प्रकृति प्रेम सिखाया। प्रकृति के विभिन्न रूपों की पूजा, उपासना और देवी-देवता मानते हैं, लेकिन उनकी रक्षा-संरक्षा के लिए हम कतई उदासीन हो चले हैं। दुनिया को प्रकृति प्रेम भूटान से सीखना चाहिए। दुनिया का सबसे हरियाली युक्त देश भूटान सौभाग्य से हमारा पड़ोसी देश है। रकबा महज 38331 वर्ग किमी है। इतना बड़ा तो हमारा केरल एक प्रदेश है। या यूं कहें सिर्फ राजस्थान के रकबे में दस भूटान को बसाया जा सकता है। देश का 70 फीसद हिस्सा हरियाली से आच्छादित है। करीब तीन चौथाई हिस्सा कार्बन डाईऑक्साइड के सोखने के काम में आता है। देश के 7.5 लाख लोग जितना कार्बन डाईऑक्साइड अवमुक्त करते हैं, उसका तीन गुना खत्म करते हैं।

सकल राष्ट्रीय खुशहाली

भूटान सकल राष्ट्रीय खुशहाली सूचकांक के आधार पर अपनी नीतियां निर्धारित करते हैं। चार स्तंभों पर खड़े इस सूचकांक में एक स्तंभ पर्यावरण संरक्षण भी है। दुनिया का यह अकेला देश है जिसने अपने वनों को बचाने के लिए संवैधानिक प्रावधान कर रखा है। इस प्रावधान के अनुसार किसी भी समय भूटान के क्षेत्रफल का 60 फीसद हिस्सा वनों से आच्छादित होना चाहिए। देश ने इमारती लकड़ी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। समस्त बिजली जरूरतें पनबिजली स्रोतों से पूरी होती हैं। ज्यादा बिजली बनाकर यह पड़ोसी देशों को बेचता है। महज इसी तरीके से यह सालाना 44 लाख टन कार्बन उत्सर्जन को कम कर लेता है। 2025 तक बिजली निर्यात से 2.24 करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन को हर साल कम करने का लक्ष्य रखा है।

…तो डूब जाएगी मुंबई

10 लाख हेक्टेयर तटीय परिस्थितिकी तंत्र का रकबा जो न्यूयॉर्क शहर के बराबर है हर साल खत्म हो रहा है। वायुमंडल में 408 पीपीएम कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता 30 लाख साल का सर्वाधिक आंकड़ा है। 11 फीसद कुल ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन वनों के कटने की वजह से हो रहा है। करीब इतना ही उत्सर्जन धरती पर दौड़ रहे सभी तरीके के वाहनों से हो रहा है। वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग की अवधारणा पेश करते हुए चेताया कि यदि हमने ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन काबू नहीं किया तो हमारी हरी धरती आग के गोले में तब्दील हो जाएगी। इस हफ्ते अतरराष्ट्रीय पत्रिका नेचर कम्युनिकेशन जर्नल में प्रकाशित इस खबर ने सबको सकते में डाल दिया है कि भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई 2050 तक समुद्र का जल स्तर बढ़ने से डूब जाएगी।

प्रकृति के साथ चलने में फायदे ही फायदे

मानवजनित उपायों की तुलना में पारिस्थितिकी का संरक्षण चार गुना ज्यादा किफायती है। डूबते मालदीव में समुद्र के किनारे तटीय दीवार बनाने की लागत करीब 2.2 अरब डॉलर है। इसके रखरखाव की लागत अलग है। अगर प्राकृतिक कोरल रीफ को ही संरक्षित कर लिया जाए तो यह चार गुनी किफायती साबित होगी। यदि हम जलवायु समस्या का प्राकृतिक समाधान करें तो 2.3 लाख करोड़ डॉलर के रोजगार सृजित होंगे। इससे लोग गरीबी के दलदल से बाहर निकलेंगे और आर्थिक उत्पादकता भी बढ़ेगी। ये सब वार्मिंग के खात्मे के साथ बोनस होगा। अगर सिर्फ कटते और क्षरण होते वनों को रोक दिया जाए तो आठ करोड़ नए रोजगार सृजित हो सकते हैं। एक अरब लोग गरीबी की दलदल से बाहर निकल सकते हैं। 2.3 लाख करोड़ डॉलर उत्पादकता में वृद्धि संभव है।