नहीं घटी मोदी की लोकप्रियता,‘बदल रही हैं राजनीति की हवाएं’

पत्रकार शेखर गुप्ता ने ‘द प्रिंट’ में अपने लेख में दावा किया है कि राजनीतिक हवाएं बदल रही हैं। करीब दो साल पहले जब अर्थव्यवस्था झटका खाने लगी थी, हिंदुत्व के साथ मिलाकर उग्र राष्ट्रवाद की हवा बहाई गई। खासकर लोकसभा चुनाव के समय यह हवा चरम पर थी। बालकोट और अभिनंदन प्रकरण ने इन हवाओं को और तेज किया।

फीका पड़ा फार्मूला
पिछले सप्ताह हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे आए हैं। यह बदलती राजनीतिक हवा का पहला बड़ा संकेत हैं। राष्ट्रवाद और धर्म को मिलाकर तैयार फार्मूला यहां फीका पड़ता नजर आया। हरियाणा में पिछले पांच महीने में भाजपा ने 21.5 फीसदी वोट गंवा दिए हैं। लोकसभा चुनाव में पार्टी को राज्य में 58 फीसदी वोट मिले थे मगर विधानसभा चुनाव में 36.5 फीसदी ही मत मिले। सरकार भी जोड़-तोड़ से बनानी पड़ रही है। मगर अभी उसके वोट कांग्रेस से 9 फीसदी ज्यादा हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ये नतीजे अनुच्छेद 370 के कई प्रावधान खत्म किए जाने के 11 सप्ताह के भीतर और ‘हाउडी-मोदी’ के सिर्फ 5 सप्ताह बाद आए हैं। इस दौरान भी धर्म और राष्ट्रवाद के मुद्दे जोरशोर से उठे। ममलापुरम में शी-जिनपिंग के साथ मोदी टीवी पर छाये रहे। पी चिदंबरम और डीके शिवकुमार की गिरफ्तारी तथा प्रफुल्ल पटेल का इकबाल मिर्ची के साथ आतंकवाद को वित्तपोषण जैसे आरोप भी सामने आए।

  • मोदी की लोकप्रियता में कमी नहीं मगर लोगों का मूड बदलने लगा
  • हरियाणा में 21.5% वोट गंवाए भाजपा ने

राष्ट्रवाद, धर्म और जनकल्याण का फार्मूला 
लोकसभा चुनाव के समय मतदाता भी इससे सहमत हो गये कि भारत को पकिस्तान की ओर से आतंकवाद का लगातार सामना करना पड़ रहा है और पिछले सत्तर साल में इसके खिलाफ किसी ने कुछ नहीं किया। अब नरेंद्र मोदी इसे जड़ से खत्म करने में जुटे हैं। पाकिस्तान को अलग-थलग कर दिया है। पाकिस्तान का मुस्लिम देश होना और जिहाद के नाम पर भारत में आतंकवादी भेजना, ये सब कारण थे जो इस तरह के राष्ट्रवाद के पक्ष में जाते थे। इसने हिंदुओं को एकजुट की जरूरत का एहसास कराया। यह भी सच है कि चुनाव सिर्फ इतने से नहीं जीता जाता गरीबों के कल्याण के लिए 12 लाख करोड़ के काम भी हुए। इनमें रसोई गैस, शौचालय, घर और मुद्रा ऋण शामिल हैं। इस वजह से लोगों ने नोटबंदी के बाद गिरती विकास दर और बढ़ती बेरोजगारी को भी अनदेखा कर दिया।

उदासी और चिंता भारी
इसलिए कहा जा सकता है कि अब धर्म और राष्ट्रवाद की हवाएं ठप अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी से फैली उदासी और चिंताओं को नहीं छुपा पा रहीं। पाकिस्तान पर ताजा स्ट्राइक, कश्मीर और आतंकवाद पर प्रहार की बातें भी इसे नहीं पलट सकीं।