डॉक्टरों को किया गलत साबित, जिंदगी से निराश हुए लोगों के लिए Idol बना यह लड़का

नई दिल्ली(दमनप्रीत कौर): 11 अक्तूबर 1990 को सतीश कुमार गुलाटी तथा वीना रानी जो उस समय अलावलपुर (जालन्धर) में रहते थे, के घर दो बेटियों के बाद बेटे की किलकारी गूंजी तो परिवार के हर सदस्य का चेहरा खिल गया। उसका नाम रखा गया कन्नू गुलाटी परंतु यह खुशी तब उदासी में बदल गई जब कन्नू के माता-पिता को यह पता चला कि उनका बच्चा डाऊन टू सिंड्रोम से ग्रस्त है जिसे आम लोग मंदबुद्धि कहकर बुलाते हैं। बस उस दिन से परिवार के संघर्ष का दौर शुरू हो गया।

बच्चों के खेलों में भी लिया कन्नू ने हिस्सा
कन्नू के माता-पिता ने कोई डाक्टर नहीं छोड़ा जहां न गए हों। पर अधिकांश डाक्टरों ने यह कह कर उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि इस रोग का कोई इलाज नहीं है। यह चल-फिर नहीं सकेगा और न ही अपनी प्रमुख जरूरतों की पूॢत कर सकेगा। यह बात सुनकर कन्नू के माता-पिता मायूस तो जरूर हुए पर टूटे नहीं। माता-पिता ने उस दिन से ही कन्नू का अधिक से अधिक ध्यान रखने तथा उसे कम से कम अपने रोजमर्रा के काम करने योग्य बनाने की ठान ली। डाक्टरों ने कहा था कि कन्नू चल-फिर भी नहीं सकता परंतु मां का दिल नहीं माना। वह उसके शरीर की मक्खन-घी से मालिश करने लगीं। कई वर्षों तक मक्खन  की मालिश और मां की मेहनत रंग लाई। कन्नू न केवल अपने पैरों पर चलने के काबिल हुआ, बल्कि उसने विशेष बच्चों के खेलों में भी हिस्सा लिया।

लोगों ने दी थी कन्नू को होस्टल छोडऩे की सलाह
कन्नू को दुनियादारी का पता चल सके इसलिए उसके पिता जहां भी जाते कन्नू को अपने साथ लेकर जाते। घर का सामान खरीदने से लेकर विवाह-शादी समारोहों में उसे लेकर जाते। अधिकतर लोगों ने उन्हें कन्नू को होस्टल में छोडऩे की सलाह दी पर कन्नू के माता-पिता ने उससे घर के माहौल तथा अपने संरक्षण में रखना ही उचित समझा। परिवार ने बड़े प्यार से छोटी-छोटी बातें सिखानी  शुरू कर दीं। परिवार ने उसके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए उसे जालन्धर में विशेष बच्चों के सेंट जोसेफ स्कूल में दाखिल करवा दिया। इस स्कूल में रहते हुए कन्नू ने विभिन्न खेलों व पेंटिंग मुकाबलों में भाग लिया तथा अनेक ईनाम भी जीते। इनमें दो बार पंजाब स्टेट स्पैशल ओलिम्पिक में स्वर्ण व कांस्य जीतना, एक ट्रस्ट द्वारा आयोजित मुकाबलों में पहला स्थान, मोहाली में हुए पेंटिंग मुकाबलों में पहला स्थान प्राप्त करना आदि शामिल है। सभ्याचारक मुकाबलों में कन्नू ने ज्यादातर पहला और दूसरा स्थान हासिल किया।

बच्चों को बैग बनाना सिखाता है कन्नू 
बाद में जब कन्नू का परिवार लुधियाना में आकर रहने लगा तो कन्नू का प्रशिक्षण जारी रखते हुए उसे निर्दोष स्कूलज में दाखिल करवा दिया गया और कन्नू ने यहां भी न केवल विभिन्न मुकाबले जीते, बल्कि कन्नू ने यूथ मामलों व खेल मंत्रालय द्वारा आयोजित  खेलों में कांस्य पदक जीता। सभ्याचारक मुकाबलों व पेंटिंग मुकाबलों में भी कन्नू ने कई ईनाम प्राप्त किए।उसे कई बार भारत विकास परिषद ने भी सम्मानित किया है। निर्दोष स्कूल में कन्नू ने पेपर बैग बनाने, कपड़े के बैग की सिलाई, मोमबत्तियां व दीये बनाने का प्रशिक्षण लिया। कन्नू की मेहनत, दृढ़ संकल्प और सीखने के जज्बे को देखते हुए स्कूल की मैनेजमैंट कमेटी ने कन्नू को स्कूल में बतौर स्टाफ रखने का फैसला लिया गया। अब कन्नू वहां बच्चों को बैग बनाना सिखाता है तथा मेहनताने के तौर पर उसे 2200 रुपए मासिक मिलते हैं।

कन्नू की रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल है मंदिर जाना
कन्नू को पेंटिंग और संगीत का शौक है। मंदिर जाना कन्नू की रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल है। हर रोज शाम को वह राधा-कृष्ण मंदिर जाता है। ढोलक बजाना और अरदास में शामिल होना उसका नित्य का नियम है। कन्नू की शारीरिक स्थिति देखकर लोगों ने कन्नू तथा उसके माता-पिता का हौसला तोडऩे का प्रयत्न भी किया पर वे अडिग रहे। कन्नू माता-पिता व अपनी मेहनत से समाज में अपनी पहचान बना रहा है। जिस कन्नू को डाक्टरों ने बिल्कुल अक्षम करार दिया था, आज वह दूसरों के लिए रास्ता बताने वाला बन रहा है।